कुछ शब्द

 

आशीर्वचन


हिंदी काव्यभाषा का उत्कर्ष छायावाद में देखा जाता है और उसमें भी जयशंकर प्रसाद के काव्य में। इस तथ्य को लेखिका ने सम्यक् रूप से इस ग्रंथ में दिखा दिया है। लेखिका को समग्र हिंदी काव्य-परम्परा का विशद ज्ञान है। साथ ही काव्य की उसकी सूझ-बूझ भी प्रौढ़ और पूर्ण है। काव्यभाषा की सही परख हिंदी के कम आलोचकों को है। मुझे यह देखकर बड़ा संतोष हुआ कि लेखिका ने काव्यभाषा विषयक मानक ग्रंथों का अध्ययन कर तदविषयक अपनी समझ को पुष्ट किया है जिसका प्रमाण ग्रंथ में पग-पग पर प्राप्त होता है। बड़ी सुविचारित योजना के अनुसार यह ग्रंथ तैयार हुआ है, फलत: इसमें कहीं कोई त्रुटि दिखायी नहीं पड़ती है। लेखिका ने प्रतिपाद्य विषय की प्राथमिक और द्वितीयक दोनों प्रकार की सामग्रियों का गम्भीर आलोड़न किया है। उसमें अपने मंतव्य को युक्ति और सफाई के साथ प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता है। विवेच्य विषय के साथ-साथ ग्रंथ की भाषा भी ध्यान आकृष्ट करती है। इस ग्रंथ की भाषा आलोचना की आदर्श भाषा है जो प्रतिपाद्य विषय को रमणीय रूप में प्रस्तुत करती है।

इस सुंदर ग्रंथ की प्रस्तुति के लिये मैं श्रीमती रचना आनंद गौड़ को हार्दिक बधाई देता हूँ तथा इसके प्रकाशन का स्वागत करता हूँ।


---- सियाराम तिवारी

Comments